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क्रीडा महोत्सव निबंध मराठी

क्रीडा महोत्सव निबंध मराठी, सो उसने झट से उठा लिया, तभी सुषमा बोली – सॉरी शंकर, वो कार्ड मेने ग़लती से फेंक दिया, वो मुझे वापस दे दो, मे दूसरा कार्ड फेकुंगी…, लेकिन अपने मैके में रहते हुए किसी और मर्द से वो संबंध नही बनाना चाहती थी, जिससे उसके माँ-बाप को शर्मिंदा होना पड़े…

उसने शंकर के लंड को यहीं चैन से खड़े नही होने दिया, अपने घुटनो को एकदुसरे के करीब लाई जिससे उसकी सुरंग का रास्ता और चौड़ा और साफ, किसी एक्सप्रेसवे की तरह हो गया…, आज बेचारे पलंग की तो शामत ही आ गई, सारी रात धक्कों की मचक झेलते-झेलते उसके सारे अंजर-पंजर ढीले पड़ गये…, गनीमत रही कि वो धराशयाई नही हुआ बस….!

उसने सोचा, ये कैसे गीला हो रहा है, लगता है नालयक ने पाजामा में ही पेसाब कर लिया, लेकिन ऐसा पहले तो इसने बचपन में भी कभी नही किया तो आज कैसे…? क्रीडा महोत्सव निबंध मराठी लगातार रस छोड़ रही लाजो की चूत को भोला चपर चपर करके चाट रहा था.., इतना गरम सीन देख कर रंगीली की आँखें वासना से सुर्ख हो गयी..,

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  1. और उसकी गान्ड के नीचे एक हाथ रखकर वो अपनी कमर को आगे पीछे करने लगे…, हवा में लटकी रंगीली कुच्छ करने की स्थिति में नही थी,
  2. जहाँ सेठानी अभी भी एक नौकर द्वारा अपने मालिक की बेटी की जान बचाना उसका फ़र्ज़ बता रही थी, वहीं सुषमा शंकर को देवता का स्वरूप मानकर चल रही थी, कामवाली के साथ चुदाई
  3. अब सलौनी के कच्चे अमरूद उसकी आँखों के ठीक सामने थे, जो गीली समीज़ में होते हुए बेआवरण जैसे ही लग रहे थे, खैर इसी तरह समय गुजर रहा था…! और शंकर इस कच्ची उमर में ही लगभग 6 फीट लंबा, 40 का मजबूत कसरती सीना हो गया था उसका,
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  5. इतना कहकर वो उसे फिर से मारने दौड़े, तब तक शंकर उनके बीच आकर खड़ा हो गया, और बोला – अब बस करो बहुत पीट लिया तुम लोगों ने, अब और नही… रंगीली अपने आप पर इतराते हुए इठलाकर बोली – ऐसी क्या खास बात हैं मुझमें, जो एक भरपूर जवान बहू के आगे आप मुझे तबज्जो दे रहे हैं..,

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जहाँ सुषमा का मायका लाला से भी कई गुना ज़्यादा समृद्ध था, वहीं लाजो के ग़रीब माँ-बाप उसे अपने घर में अब पनाह भी नही दे सकते थे…,

फिर उसकी गान्ड की गोलाईयों को मसल्ते हुए अपनी उंगलियाँ जांघों के बीच फँसा दी और उसकी चूत की फांकों के बगल तक मालिश करने लगी…! माला वेशक नादान लडकी थी लेकिन इस वक्त वो इश्क से भरे मन की चाशनी में लिपटी जलेबी हुई जा रही थी बोली, तुम्हें मेरा नाम पता है? माला ने मानिक के मुंह की बात छीन ली थी. बोला, नही. मैंने तो आपको इस घर में छत पर पहली बार देखा था.

क्रीडा महोत्सव निबंध मराठी,इन सब बातों से अंजान, रंगीली का शेर शंकर जैसे ही हवेली जाने के लिए वापस मुड़ा, उसका सामना घर में घुस रहे उसके धर्म पिता.. अरे अपने रामू भैया, जो लाला के खेतों से काम करके लौट रहे थे उनसे हो गया…!

वो समझने लगी थी, कि उसका लंपट, ठरकी मालिक उससे क्या चाहता है.., जिसे वो किसी भी कीमत पर नही होने दे सकती…!

शंकर ने उसके बाजुओं के बंधन को अपने शरीर से अलग किया, और खड़े होते हुए बोला – दरवाजा खुला है दीदी, यहाँ आजकल लोग ताका-झाँकी बहुत करते हैं,काजल अग्रवाल की सेक्स वीडियो

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